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रंगा - बिल्ला

आज हम आपको बताने जा रहे है नई दिल्ली में 1978 में हुए एक केस के बारे में जिसे लोग रंगा – बिल्ला केस या गीता और संजय चोपड़ा किडनैपिंग केस के नाम से भी जानते हैं

गीता चोपड़ा उम्र 16 साल, उनके भाई संजय चोपड़ा उम्र 14 दोनो छात्र ही और इनके पिता मदन मोहन चोपड़ा नेवी में कैप्टन थे और इनका परिवार धौला कुआं ऑफिसर्स एनक्लेव में रहता था।

26 अगस्त 1978, शनिवार का दिन गीता और संजय को आल इंडिया रेडियो पर शाम 7 बजे के एक शो जिसका नाम युवा वाणी था उसमे हिस्सा लेना था जिसके लिए वो लोग घर से निकले थे। और यह शो खत्म होने के बाद उनके पिता उनको 9 बजे रात को आल इंडिया रेडियो ऑफिस के बाहर लेने आने वाले थे।

तभी एक आदमी ने बंगला साहिब गुरुद्वारे (दिल्ली) के पास शाम के करीब 6:30 बजे देखा की एक पीले रंग की फिएट कार में से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। उन्होंने अपना स्कूटर रोका और गाड़ी की ओर बढ़े तब उन्होंने देखा की एक लड़की ड्राइवर सीट पर बैठे आदमी के बाल खींच रही है और एक लड़का उस आदमी से लड़ रहा है जो ड्राइवर के साथ है हालांकि वो गाड़ी को रोक नहीं पाए कुछ और लोगो ने भी गाड़ी को रोकने ka प्रयास किया लेकिन वो लोग भी गाड़ी को रोक नहीं पाए। और उन्होंने उसके बाद पुलिस में खबर कर दी। और उस गाड़ी का नंबर भी बताया।

इंद्रजीत सिंह जो की DDA में जूनियर इंजीनियर थे उन्होंने भी यह गाड़ी देखी और कुछ देर इसके साथ चलते रहे और देखा की लड़की चिल्ला रही है और लड़के ने उनको अपने कंधे से निकल रहे खून को दिखाया और उनसे मदद मांगी। बाद में वह कार का पीछा नहीं कर पाए क्योंकि कार ने ट्रैफिक तोड़ा और भाग गई।

इसी बीच बच्चो के पिता और कैप्टन ने को जब पता चला की उनके बच्चों का शो नही हुआ तब वह तुरंत आल इंडिया रेडियो के ऑफिस पहुंचे जहां उनको पता चला की उनके बच्चे तो यहां पहुंचे ही नही। तब उन्होंने अपने बच्चों को ढूढना शुरू किया हालांकि उनके बहुत ढूंढने पर भी बच्चे नही मिले फिर उन्होंने धौला कुआं पुलिस स्टेशन में कंप्लेन लिखवाई।

उसके बाद पुलिस ने इस केस को महत्वपूर्णता से लिया और जांच शुरू की पुलिस ने जांच करना शुरू किया हर जगह ढूंढा गया जहां जहां लोगो ने उन्हें देखा था लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला
फिर दो दिन बाद धनी राम नाम के एक चरवाहे ने एक लड़की की लाश दिल्ली पहाड़ क्षेत्र में देखी सड़क से पांच मीटर दूर तब उसने तुरंत पुलिस को बुलाया उसके बाद आस पास छान बीन करने पर पता चला की वही कुछ दूर और एक लड़के की भी लाश पड़ी मिली यह दोनो लाश संजय और गीता की ही थी जोकि उनके माता पिता के द्वारा पहचाना गया।

लाश मिलने के बाद कहानी ने जोर पकड़ी और उस समय यह मामला सदन में उठने लगा राज्य सभा में तो उस वक्त के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के इस्तीफे की मांग भी उठने लगी उस समय देश में जनता पार्टी की सरकार थी और उनको इस केस के लिए बहुत विरोध का सामना करना पड़ा था।

हालांकि की वह लोग जिन्होंने इन दोनो का अपहरण कर इनकी हत्या कर दी थी वह कुछ हफ्तों बाद आगरा में कालका मेल ट्रेन में पकड़े गए जब वह दोनो गलती से ट्रेन के मिलिट्री कंपार्टमेंट में चढ़ गए और जवानों से उलझने लगे तब जवानों ने उनकी पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। जब उनकी तलाशी ली गई तब उनके पास से तलवार खून लगे कपड़े बरामद किए गए। बाद में उनसे पूछ – ताछ में पता चला की उनके नाम कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला हैं। और फिर उन्होंने यह माना की इन दोनो बच्चों का अपहरण इन्होंने ही पैसों के लिए किया था लेकिन जब इनको पता चला की उनके पिता नेवी में कैप्टन है तो डर कर इन लोगों ने उन दोनो मासूमों को मार दिया।

बाद में इन्हे हाईकोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई फिर इन्होंने सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया लेकिन वहा से भी इनको कोई कामयाबी नहीं मिली उसके बाद इन लोगों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपनी सजा कम करना चाहा लेकिन वहा भी इन्हे निराशा हाथ लगी। 31 जनवरी 1982 को दोनो को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई।

 

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